|

माँ के पेट में थे तभी पिता चल बसे, माँ को घर चलाने के लिए करना पड़ा गंदा काम, छोटी सी झोपड़ी में 10 दिन रहते थे, अब बेटा बन गया IAS

इन्सना गरीबी में या तो संतुलन खो बैठता है या फिर निखर जाता है. आज हम आपको  आपको 2011 बैच के IAS डॉ. राजेंद्र भारूड़ की कहानी बताने जा रहे हैं। जिन संघर्षों से इन्होने ये मुकाम पाया है वह एक मिसाल है। जिन्होंने ऐसे वक्त मुश्किल वक्त को काटा है जिसको पढकर आपके रौंगटे खड़े हो जायंगे.

डॉ राजेंद्र भारूड़ महाराष्ट्र के धुले जिले के रहने वाले हैं। ये आदिवासी भील समाज से आते हैं। डॉ राजेंद्र बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखते हैं। यहाँ बहुत कम पढ़े लिखे लोग होते हैं, राजेन्द्र ने आपने पिता का मुंह भी नही देखा था.डॉ राजेंद्र जब मां के गर्भ में थे उसी समय इनके पिता की मौत हो गई थी।

पिता की मौत के बाद इस परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। गन्ने की पत्तियों से बनी छोटी सी झोपड़ी में राजेंद्र का पूरा परिवार रहता था। परिवार के 10 सदस्य इसी झोपड़ी में गुजारा करते थे।जब राजेन्द्र छोटे थे तो  घर चलाने के लिए राजेंद्र की मां ने शराब बेंचना शुरू कर दिया। दिन भर उनके घर में शराब खरीदने व पीने वालों का जमावड़ा लगा रहता था। राजेंद्र को इसी माहौल में रहने को मजबूर होना पड़ा। इसी घर में रहकर उन्होंने पढ़ाई की।

राजेन्द्र चौथी क्लास में पढ़ते थे वो बताते हैं वह घर के बाहर चबूतरे पर बैठकर पढ़ते थे। लेकिन, शराब पीने आने वाले लोग उन्हें कोई न कोई काम बताते रहते थे। उससे बचने वाले पैसे से राजेंद्र किताबें खरीदते थे।राजेंद्र साल 2011 में कॉलेज के बेस्ट स्टूडेंट बने। उसी साल उन्होंने यूपीएससी का फॉर्म भरा और पहली बार में सी सिलेक्ट हो गए। वह IAS होने के बाद कलेक्टर बन गए।

 

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published.